92435. سَحَقَ1 92436. سُحْق1 92437. سَحْق1 92438. سحق20 92439. سَحَقَ 1 92440. سُحْقًا192441. سَحْقًا1 92442. سَحَقَهُ1 92443. سحقه1 92444. سحك6 92445. سحَكَ1 92446. سحل18 92447. سَحَلَ1 92448. سَحْل1 92449. سَحَلَ 1 92450. سحلب2 92451. سحلت2 92452. سحلفا1 92453. سَحْلو1 92454. سِحْلِينُ1 92455. سَحَمَ1 92456. سحم17 92457. سَحَمَ 1 92458. سحمة1 92459. سَحَمة1 92460. سُحْمِيّ1 92461. سحن16 92462. سَحَنَ 1 92463. سَحْنَانِي1 92464. سَحْنَةُ1 92465. سِحْنَة1 92466. سَحْنون1 92467. سِحْنون1 92468. سَحْنُون1 92469. سِحْنُوني1 92470. سَحْنونِي1 92471. سِحْنِيّ1 92472. سَحْنِي1 92473. سحو6 92474. سحو وسحى1 92475. سحو/سحي1 92476. سَحُوَ 1 92477. سَحْوَاني1 92478. سحود1 92479. سُحُور1 92480. سَحْوِيّ1 92481. سحى2 92482. سحي1 92483. سحيا1 92484. سَحْيَا1 92485. سحيان1 92486. سُحَيَّان1 92487. سَحْيَان1 92488. سُحَيَّانِيّ1 92489. سُحَيّانِي1 92490. سُحَيْبَان1 92491. سَحْية1 92492. سحية1 92493. سحيح1 92494. سحيحي1 92495. سُحَيْري1 92496. سَحِيري1 92497. سَحِيل2 92498. سُحَيْل1 92499. سُحَيْلان1 92500. سحيلان1 92501. سُحَيْم1 92502. سَحِيم1 92503. سُحَيْمٌ1 92504. سَحِيمون1 92505. سحينة1 92506. سُحَيْنة1 92507. سُحَيْني1 92508. سَحْيُون1 92509. سَحْييّ1 92510. سخّ1 92511. سخ1 92512. سَخَّ 1 92513. سَخَأَ1 92514. سخأ2 92515. سخا3 92516. سَخَا1 92517. سَخا1 92518. سَخَاء1 92519. سخاء1 92520. سَخَاخُ1 92521. سَخَاخِنِيّ1 92522. سَخّار1 92523. سِخَالُ1 92524. سِخَامُ1 92525. سُخام1 92526. سَخَاوي1 92527. سَخَبَ1 92528. سخب10 92529. سَخَبَ 1 92530. سخبر7 92531. سَخْبَرَ1 92532. سَخْبَرٌ1 92533. سخت12 92534. سَخْت1 Prev. 100
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{سُحْقًا}
وسأل نافع بن الأزرق عن قوله تعالى: {فَسُحْقًا}
فقال ابن عباس: بُعداً. واستشهد بقول حسان:
ألاَ مَنْ مُبْلغٌ عَنَّى أُبَيَّا. . . فقد أُلْقِيتَ في سُحْقِ السعيرِ
(تق) ورد في (ك، ط) : يهجو أبي بن خلف
= الكلمة من آية الملك 11:
{وَقَالُوا لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ أَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا فِي أَصْحَابِ السَّعِيرِ (10) فَاعْتَرَفُوا بِذَنْبِهِمْ فَسُحْقًا لِأَصْحَابِ السَّعِيرِ}
وحيدة الصيغة في القرآن، ومعها سحيق في آية الحج 31:
{وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَكَأَنَّمَا خَرَّ مِنَ السَّمَاءِ فَتَخْطَفُهُ الطَّيْرُ أَوْ تَهْوِي بِهِ الرِّيحُ فِي مَكَانٍ سَحِيقٍ}
سحقاً: بُعَداً، هو تأويل الطبري للكلمة وأسنده بهذا اللفظ عن ابن عباس. والقرآن خَصَّ السحقَ بهذا السياق في نذير الكفار المشركين، على حين استعمل البعد بدلالة أعم، فمنه البعد المكاني في الشقة والأسفار وبعد المشرقين، والبعد الزماني في أمدٍ بعيد، وفي مقابل قريب زمناً، ومنه البعد المجازي في شقاقٍ وضلالٍِ ورجعٍ بعيد، وبعداً للقوم الظالمين، ولعادٍ ولثمودَ ولمدينَ. . .
والبعد نقيض القرب، حسياً ومعنويّاً. وأما الحسق ففيه دلالة انسحاق وتفتتُّ، من أصل معناه في تَفتيت المسحوق، ومنه قيل السحق، للثوب البالي. وفي (مقاييس اللغة) لمادة سحق أصلان: أحدهما البعد ومنه {فَسُحْقًا لِأَصْحَابِ السَّعِيرِ} والآخر إنهاك الشيء حتى يُبلغَ به إلى حال البلى، ومنه السحق الثوب البالي.
ودلالة الهلاك في {سُحْقًا} واضحة. ويقرب كذلك أن يفهم "سحيق" في آية الحج، بالهاوية، من نصها {أَوْ تَهْوِي بِهِ الرِّيحُ فِي مَكَانٍ سَحِيقٍ} كما يفهم قول حسان - رضي الله عنه - * سحق السعير * بغور السعير.