139571. نقع20 139572. نَقَعَ1 139573. نَقْع1 139574. نَقْع الماء1 139575. نَقَعَ 1 139576. نَقْعًا1139577. نَقْعَاء1 139578. نَقَفَ1 139579. نقف14 139580. نَقَقَ1 139581. نقق10 139582. نَقَلَ1 139583. نقل17 139584. نُقْل1 139585. نَقِل1 139586. نَقَل1 139587. نَقْل1 139588. نقل النّور1 139589. نَقَلَ 1 139590. نقلا1 139591. نَقْلا1 139592. نَقْلات1 139593. نَقِّلاويّ1 139594. نَقْلَة1 139595. نقلس2 139596. نَقَلَهُ1 139597. نَقله1 139598. نُقْلِيّ1 139599. نَقَليّ1 139600. نَقْلِيّ1 139601. نَقِمَ1 139602. نَقَمَ1 139603. نُقَمٌ1 139604. نقم18 139605. نَقِمَ من1 139606. نَقَمَ 1 139607. نَقْمات1 139608. نقمان1 139609. نَقْمَان1 139610. نَقْمَة1 139611. نِقْمَت1 139612. نَقَمَى1 139613. نُقْمَى1 139614. نقن1 139615. نَقَنَّةُ1 139616. نقنس1 139617. نِقِنِّسُ1 139618. نقنق4 139619. نَقِهَ3 139620. نقه14 139621. نَقَهَ 1 139622. نقو6 139623. نَقْوُ1 139624. نقو ونقي1 139625. نَقْوَاء1 139626. نَقُوس1 139627. نَقْوس1 139628. نَقُوسيّ1 139629. نقوش2 139630. نقوعي1 139631. نَقُوعيّ1 139632. نقولا1 139633. نَقُوم1 139634. نقوم1 139635. نقى2 139636. نَقِيَ1 139637. نقي6 139638. نَقِيّ1 139639. نِقْيٌ1 139640. نِقْي1 139641. نقي الخدّ1 139642. نَقِيَ 1 139643. نِقْيَا1 139644. نَقِيبٌ1 139645. نقيب1 139646. نَقِيبَة1 139647. نَقِيَّة1 139648. نَقْيَة1 139649. نُقَيْدُ1 139650. نُقَيد1 139651. نُقَيْدان1 139652. نَقِيَدان1 139653. نقير1 139654. نَقِيرًا1 139655. نقيران1 139656. نُقَيْرَان1 139657. نَقِيران1 139658. نَقِيرَة1 139659. نقيرة1 139660. نُقَيْرَةُ1 139661. نَقِيزَةُ1 139662. نقيس1 139663. نقيض2 139664. نَقِيعٌ1 139665. نَقِيعة1 139666. نَقِيل1 139667. نَقِيلُ صَيْدٍ1 139668. نِقِيلي1 139669. نَقِيلي1 139670. نَقِيُّن1 Prev. 100
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{نَقْعًا}
وسأل نافع بن الأزرق عن قوله تعالى: {فَأَثَرْنَ بِهِ نَقْعًا}
فقال ابن عباس: النقع ما يسطع من حوافر الخيل. سأله نافع: وهل تعرف العرب ذلك؟ قال: نعم، أما سمعت قول حسان:
عَدِمْنَا خَيْلَنا إن لم ترَوها. . . تثير النقعَ، موعدها كدَاءُ
(تق، ك، ط)
= الكلمة من آية العاديات:
{وَالْعَادِيَاتِ ضَبْحًا (1) فَالْمُورِيَاتِ قَدْحًا (2) فَالْمُغِيرَاتِ صُبْحًا (3) فَأَثَرْنَ بِهِ نَقْعًا (4) فَوَسَطْنَ بِهِ جَمْعًا (5) إِنَّ الْإِنْسَانَ لِرَبِّهِ لَكَنُودٌ}
وحيدة في القرآن صيغة ومادة.

وتفسير النقع المثار بما يسطع من حوافر الخيل، تقريب أخذ السطوع من الآية قبله: {فَالْمُورِيَاتِ قَدْحًا} دون أن يكون في النقع نفسه معنى السطوع. فالنقع الغبار، أو التراب كما في تفسير الطبري للآية ولم ينقل فيها خلافاً. وهو ما في معاني القرآن للفراء (3 / 285) وأكثر ما تستعمله العربية بهذا المعنى، فيما يثار من الخيل العاديات، ولعل ملحظ التقريب في شرحه بما يسطع من حوافر الخيل، جاء من كون النقع المثار في الغارة، يسطع فيه من شدة العَدَوِ، ما توريه حوافر الخيل من قدح الشرر.